आज का सद्चिंतन 29 July 2018
मित्रो ! जब समुद्र मथा गया था तो उसमें से सबसे पहले विष, फिर वारुणी, उसके बाद अन्य रत्न निकले थे। युग निर्माण के लिए, मूर्छित समाज को जाग्रत करने के लिए भी गायत्री संस्था द्वारा वह अमृत निकालने के लिए समुद्रमंथन का कार्य हो रहा है, जिसे पीने से यहाँ के निवासी इस देवभूमि को अमरों, भूसुरों की निवास-स्थली प्रत्यक्ष रूप में दिखा सकें।
यह समुद्र-मंथन ठीक प्रकार से चल रहा है या नहीं, इसकी प्रारम्भिक परीक्षा यही है कि इसमें कितना विष निकलता है, यह देखा जाय, जब सड़ी हुई कीचड़ की नाली साफ की जाती है तो उसमें से नाक फाड़ने वाली बदबू उड़ती है। दुर्बुद्धि की, संभावनाओं की, स्वार्थपरता और पाखण्ड की कीचड़, बहुत दिनों से हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में पड़ी सड़ रही है, उसे साफ किया जा रहा है तो वे तत्व जिनके स्वार्थों को हानि पहुँचती है, स्वभावतः विरोध करेंगे। असुरता को नष्ट करने वाले जब कभी भी अभियान हुए हैं, उनके प्रतिरोध के लिए असुरों ने पूरी शक्ति से प्रत्याक्रमण किये हैं।
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