इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 5)
इन तीन को हासिल कीजिए- सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता
(1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।
(2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है।
(3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।
.... क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14
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